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Jai Ho

धनतेरस पूजा Dhanteras Puja Vidhi How to do Dhanteras Puja

धनतेरस पूजा विधि(Dhanteras Puja Vidhi)

 

धनतेरस(Dhanteras Puja Vidhi in Hindi) का त्यौहार कार्तिक मास में दीपावली से दो दिन पहले मनाया जाता है क्योंकि देवी लक्ष्मी सागर मंथन से उत्पन्न हुई थी उसी प्रकार भगवान धनवन्तरि भी अमृत कलश के साथ सागर मंथन से उत्पन्न हुए हैं. देवी लक्ष्मी धन की देवी हैं और उनकी कृपा प्राप्त करने के साथ-साथ आपको स्वास्थय और दीर्घ आयु भी चाहिए यही कारण है दीपावली दो दिन पूर्व यानी धनतेरस के दिन धन्वंतरि की पूजा की जाती है और इसी दिन से घरों में दीपामालाएं और झालरें सजने लगती हैं.

धनतेरस पर्व क्यों मनाया जाता है और इस दिन सोने व चांदी के आभूषण तथा बर्तन आदि क्यों खरीदे जाते हैं इसके पीछे यह कारण माना जाता है कि यह चन्द्रमा का प्रतीक है जो शीतलता प्रदान करता है और मन में संतोष रूपी धन निवास करता है . संतुष्टि (संतोष ) ही मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ धन बताया गया है . ये संतोष रुपी धन जिसके मन में होता है वह स्वस्थ है सुखी है और वही सबसे धनवान है. चिकित्सा के देवता भगवान धन्वन्तरि ही हैं | ऐसे देव से सेहत, स्वास्थ्य और निरोगी होने का आशीर्वाद पाने के लिए उनकी पूजा पूर्ण विधि से करनी चाहिए, इस प्रकार से मन को परम संतोष का अनुभव होता है और संतोष रूपी धन से बड़ा कोई धन नहीं है

Dhanteras Puja Laxmi

भगवान धन्वन्तरि का जन्म, कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को हुआ था इसलिए इस तिथि को धनतेरस के नाम से जाना जाता है. धन्वन्तरी जब प्रकट हुए थे तो उनके हाथो में अमृत से भरा हुआ कलश था. क्योंकि भगवान धन्वन्तरी कलश लेकर प्रकट हुए थे इसीलिए धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परम्परा है. हिन्दू मान्यता के अनुसार यह भी कहा जाता है कि इस दिन धन खरीदने से उसमें तेरह गुना वृद्धि होती है. इस अवसर पर लोग धनिया के बीज खरीद कर भी घर में रखते हैं और दीपावली के बाद इन बीजों को लोग अपने बाग-बगीचों में या खेतों में बोते हैं!.

 

धनतेरस कथा(Dhanteras Katha)

 

किसी समय में हेम नामक एक राजा थे, दैव कृपा से उन्हें पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई. ब्राह्मणों से जब कहा गया कि इस बालक की जन्म कुंडली तैयार करो तो ज्ञात हुआ कि जिस पल इस बालक का विवाह होगा उसके चार दिन पश्चात उसकी मृत्यु निश्चित ही हो जायेगी | इस तथ्य को जानने पर महाराज बहुत दुखी हुए और आदेश दिया कि इस बालक को ऐसी किसी जगह पर भेज दिया जाय जहाँ राजकुमार पर किसी स्त्री की परछाई भी ना पड़ सके | एक दिन की बात है देवयोग से प्रेरित एक स्त्री वहां से गुजर रही थी, राजकुमार की नजर उस पर पड़ी और दोनों ही परस्पर मोहित होने लगे तत्पश्चात उन्होंने गन्धर्व विवाह करके एक दूसरे के साथ प्रेम पूर्वक रहने का निश्चय कर लिया |

विवाह के उपरान्त कुंडली दोष और विधि का लिखा हुआ सन्मुख आया तथा चार दिन बाद यमदूत उस राजकुमार के प्राणहरण करके जाने लगे तभी उसकी नवविवाहित पत्नी करुण स्वर में विलाप करने लगी जिसको सुनकर यमदूत का ह्रदय पिघलने लगा किन्तु ये तो परमात्मा का विधान था इसीलिए यमदूत को मजबूरन उस राजकुमार के प्राण ले जाने पड़े | यमराज के समक्ष पहुँचने पर यमदूतों में से एक बोला कि हे ! महाराज कोई ऐसा कोई उपाय सजाएं जिससे ये राजकुमार जिस अकाल मृत्यु के प्रकोप को झेल रहा है उससे इस व्यक्ति को मुक्ति मिल जाय | उस यमदूत के इस प्रकार के विनम्र वचन सुनकर यमराज बोले कि हे ! दूत अकाल मृत्यु तो विधि का विधान है , किन्तु इससे मुक्त होने का एक बहुत सरल उपाय मैं तुमको बताता हूँ ध्यानपूर्वक सुनो ! कार्तिक कृष्णा पक्ष की रात्रि को जो मनुष्य मेरे नाम का स्मरण करके तथा पूजा आदि करके दीप माला दक्षिण दिशा की ओर भेंट करता है उस मनुष्य की अकाल मृत्यु कभी नहीं होगी वो इस भय से मुक्त रहेगा | इस पर्व पर लोग अपने घरों के बाहर दक्षिण दिशा की ओर दीप प्रज्वलित करते हैं उसका कारण यही है |

धनवन्तरीदेव पूजा(Dhanteras Pooja)

 

 

धन्वन्तरि देवताओं के वैद्य हैं और चिकित्सा के देवता माने जाते हैं यही कारण है कि यह धनतेरस पर्व का दिन वैद्य और चिकित्सकों के लिए अत्यंत मान्यता और महत्व रखने वाला होता है. कार्तिक मास में पड़ने वाले इस धनतेरस पर्व से सम्बंधित एक कथा लोगों के मध्य प्रसिद्ध है जो कि इस प्रकार है कि एक समय यमराज ने यमदूतों से प्रश्न किया कि हे दूतों ! जिस समय तुम पृथ्वी लोक में मनुष्यों के प्राण हरने हेतु जाते हो उस समय आप सब के ह्रदय में कदाचित सहानुभूति अथवा दया का भाव नहीं आता ? यमराज के समक्ष खड़े सारे दूतों ने पहले तो भय के कारण कहा कि हम सब तो अपने कर्त्तव्य का पालन करते हुए आपकी आज्ञा अनुसार भू-लोक वासियों के प्राण हरण करते हैं | किन्तु यमराज ने जब सब दूतों को समझाया और उनके मन से भय को हटाया तो फिर उन सब ने कहा कि हे महाराज ! एक समय जब हम एक राजा के पुत्र जो कुछ समय पहले विवाह बंधन में बँधा था, उसके प्राण लेते समय उनकी नवविवाहिता के विलाप को सुनकर हमारा ह्रदय पिघल गया था परंतु कर्म की गति के अनुसार हम कुछ साहस ना कर पाए |

 

धनतेरस पूजा विधि (Dhanteras Puja Vidhi in Hindi)

Bhagwan Dhanvantari God

धनतेरस पर मृत्‍युदेव यमराज जी की पूजा करने के लिए सन्‍ध्‍या के समय एक लकड़ी का पट्टा जिसको वेदी भी कहा जाता है उस पर रोली या सिन्दूर कि मदद से स्‍वास्तिक काढ़ लीजिये।

अब उस स्‍वास्तिक के मध्य में मिट्टी का एक दीपक जलाकर रखें और उस दीपक में एक कोड़ी( जिसमे छिद्र हो ) डाल दें।

अब इसके पश्चात उस दीपक के चारों ओर घुमाकर तीन बार गंगा जल छिड़क दें ।

रोली लेकर दीपक को तिलक लगावें तथा आखे चावल (अक्षत ) और मिष्‍ठान चढाएं।

अब उस दीपक में कुछ दक्षिणा ( कुछ रूपया ) रख दीजिए, पूजन आदि के बाद, किसी ब्राह्मण आदि को अर्पण कर दें।

थोड़े से फूल लेकर उस दीपक को अर्पण करें।

ये सब विधि होने के पश्चात परिवार सहित दोनों हाथ जोड़कर दीपक को विनयपूर्वक प्रणाम करके प्रत्येक सदस्य को रोली से टीका( तिलक) करें |

अपने मुख्‍य द्वार के दाहिनी ओर उस दीपक को प्रितिष्ठित करें ।

यम पूजन करने के बाद अन्‍त में धनवंतरी पूजा करें, जिसके अन्‍तर्गत कम से कम 108 बार ऊँ धं धन्‍वन्‍तरये नम: का जाप करें। मंत्र जाप पूर्ण होने पर इसे भगवान धनवंतरी को अर्पण करके सर्वदा स्वस्थ रहने का आशीर्वाद प्राप्त करने की प्रार्थना करें।इस पूजा विधि से लोग देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि का आशीर्वाद पाते हैं और मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं

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