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Jai Ho

दिवाली पूजन विधि Diwali Puja Vidhi

दीपावली पूजा विधि(Diwali/Deepavali Puja Vidhi)

दिपावली धन और समृद्धि का त्योहार है। यह त्योहार कार्तिक मास में पड़ता है। इस त्योहार में माता लक्ष्मी और गणेश भगवान के साथ ही साथ धन के राजा भगवान कुबेर ,काली माता तथा मॉ सरस्वती की पूजा की जाती है । काली माता और मॉ सरस्वती लक्ष्मी के ही तामसिक और सात्विक रुप है। जब लक्ष्मी जी .काली माता और मॉ सरस्वती तीनों एक रुप धारण करती है तब उनका वह स्वरुप महालक्ष्मी कहलाता है।

diwali puja Vidhi

दिपावली के इस त्योहार पे रात्रि के समय में गणेश भगवान का पूजन करने से ज्ञान और सद्बुद्धि का आर्शीवाद प्राप्त होता है जिसके फलस्वरुप व्यक्ति के मन में धन कमाने की लालसा तथा धन का सदुपयोग करने की समझ बढ़ जाती है। इसके साथ ही माता लक्ष्मी पूजा से प्रसन्न होकर धन का वरदान देती हैं तथा भगवान कुबेर धन संग्रह में सहायक होते हैं। इन सभी उद्देशों की पूर्ति के लिए दिपावली की रात्रि को गणेश भगवान और लक्ष्मी माता के साथ धन के राजा भगवान कुबेर की भी पुजा की जाती है।

पूजन सामग्री(Pujan Samagri)

विधिविधान से पूजन करने के लिए साम्रागी की आवश्यकता पड़ती है साम्रागी जैसे कलावा, रोली,,सिंदूर, नारियल,अक्षत, लाल वस्त्र, फूल, सुपारी, लौंग, पान के पत्ते, घी, कलश, कलश हेतु आम का पल्लव,चौकी,हवन कुण्ड, हवन सामग्री, कमल गट्टे पंचामृत ( दुग्ध, दही, घी, शहद, गंगाजल) फल, बताशे, मिठाईयां, पूजा में बैठने के लिए आसन समिधा,, हल्दी ,अगरबत्ती,कुमकुम,इत्र,दीया,रूई, आरती की थाली. कुशा, रक्त चंदनद,श्रीखंड चंदन इत्यादि।

पर्वोपचार(Parvopchar)

पूजा करने से पहले चौकी को अच्छे से धोकर उस पर रंगोली बनाए तथा उसके चारों कोनो पर दीपक जलाऍ । लक्ष्मी माता और भगवान गणेश की मूर्ति जिस स्थान पर स्थापित करना हो वहॉ पर थोड़े से चावल रखें और मूर्तियो को क्रमश : स्थापित करें । सरस्वती एवं काली माता की मूर्ति हो तो उन्हें भी रखें. लक्ष्मी माता की पूर्ण प्रसन्नता के लिए भगवान विष्णु की मूर्ति लक्ष्मी माता के बायीं ओर रखकर पूजा करनी चाहिए। आसन बिछाकर गणेश भगवान एवं लक्ष्मी जी की मूर्ति के सामने बैठ जाऍ। इसके तत्पश्चात् अपने मन को तथा आसन को इस मंत्र से शुद्धि करें “ऊं अपवित्र : पवित्रोवा सर्वावस्थां गतोऽपिवा। य: स्मरेत् पुण्डरीकाक्षं स बाह्याभ्यन्तर: शुचि :॥” इन मंत्रों से अपने ऊपर तथा आसन पर तीन-तीन ब़ड़ी से छींटें लगाकर ऊं केशवाय नम: ऊं माधवाय नम:, नारायणाय नम:, मंत्र पढ़कर फिर हाथ धोएं फिर पुन: आसन शुद्धि मंत्र बोलें :-
ऊं पृथ्वी त्वयाधृता लोका देवि त्यवं विष्णुनाधृता। त्वं च धारयमां देवि पवित्रं कुरु चासनम्॥ शुद्धि और आचमन के बाद चंदन लगाकर अनामिका उंगली से श्रीखंड चंदन लगाते हुए यह मंत्र बोलें चन्‍दनस्‍य महत्‍पुण्‍यम् पवित्रं पापनाशनम्, आपदां हरते नित्‍यम् लक्ष्‍मी तिष्‍ठतु सर्वदा। किसी भी पूजा में सर्वप्रथम भगवान गणेश जी की पूजा की जाती है। हाथ में पुष्प लेकर गणपति का ध्यान कर यह मंत्र बोलें – गजाननम्भूतगणादिसेवितं कपित्थ जम्बू फलचारुभक्षणम्। उमासुतं शोक विनाशकारकं नमामि विघ्नेश्वरपादपंकजम्।

आवाहन: ऊं गं गणपतये इहागच्छ इह तिष्ठ कहकर पात्र में अक्षत छोड़ें तथा अर्घा में जल लेकर बोलें- एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम् ऊं गं गणपतये नम:. रक्त चंदन लगाएं: इदम रक्त चंदनम् लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:, इसी प्रकार श्रीखंड चंदन बोलकर श्रीखंड चंदन लगाएं। इसके पश्चात सिन्दूर चढ़ाकर मंत्र बोलें- “इदं सिन्दूराभरणं लेपनम् ऊं गं गणपतये नम:. दर्वा और विल्बपत्र भी गणेश जी को चढ़ाकर, गणेश जी को वस्त्र धारण करवाऍ जाने के बाद इस मंत्र का उच्चारण करें – इदं रक्त वस्त्रं ऊं गं गणपतये समर्पयामि।

पूजन के बाद गणेश जी को प्रसाद अर्पित करके इस मंत्र का उच्चारण करें – इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं गं गणपतये समर्पयामि:. मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र- इदं शर्करा घृत युक्त नैवेद्यं ऊं गं गणपतये समर्पयामि। प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन कराकर इस मंत्र का उच्चारण करें – इदं आचमनयं ऊं गं गणपतये नम। इसके पश्चात पान सुपारी चढ़ायें और बोलें- इदं ताम्बूल पुंगीफल समायुक्तं ऊं गं गणपतये समर्पयामि:. अब फूल लेकर गणपति पर चढ़ाएं और बोलें- एष: पुष्पान्जलि ऊं गं गणपतये नम:

कलश पूजन(Kalash Pujan)

घड़े या लोटे पर कलावा बांधकर कलश के ऊपर आम का पत्ता रखकर कलश के अंदर सुपारी, दूव घास तथा अक्षत मुद्रा रखें। कलश में कलावा लपेटकर  और नारियल पर वस्त्र लपेट कर कलश पर रखें। हाथ में अक्षत और फूल लेकर वरूण देवता का कलश में आह्वान कर मंत्र बोलें- ओ३म् त्तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभि:। अहेडमानो वरुणेह बोध्युरुशंस मान आयु: प्रमोषी:। (अस्मिन कलशे वरुणं सांगं सपरिवारं सायुध सशक्तिकमावाहयामि, ओ३म्भूर्भुव: स्व:भो वरुण इहागच्छ इहतिष्ठ। स्थापयामि पूजयामि॥)

लक्ष्मी पूजन(Lakshami Pujan)

सर्वप्रथम माता लक्ष्मी का ध्यान करके इन मंत्रो का उच्चारण करें-

ॐ या सा पद्मासनस्था, विपुल-कटि-तटी, पद्म-दलायताक्षी।
गम्भीरावर्त-नाभिः, स्तन-भर-नमिता, शुभ्र-वस्त्रोत्तरीया।।
लक्ष्मी दिव्यैर्गजेन्द्रैः। मणि-गज-खचितैः, स्नापिता हेम-कुम्भैः।
नित्यं सा पद्म-हस्ता, मम वसतु गृहे, सर्व-मांगल्य-युक्ता।।

इसके बाद लक्ष्मी देवी की प्रतिष्ठा करें और हाथ में अक्त लेकर बोलें ॐ भूर्भुवः स्वः महालक्ष्मी, इहागच्छ इह तिष्ठ, एतानि पाद्याद्याचमनीय-स्नानीयं, पुनराचमनीयम्।”
प्रतिष्ठा के बाद स्नान कराएं और बोले-ॐ मन्दाकिन्या समानीतैः, हेमाम्भोरुह-वासितैः स्नानं कुरुष्व देवेशि, सलिलं च सुगन्धिभिः।। ॐ लक्ष्म्यै नम: ॐ मन्दार-पारिजाताद्यैः, अनेकैः कुसुमैः शुभैः। पूजयामि शिवे, भक्तया, कमलायै नमो नमः।। ॐ लक्ष्म्यै नमः, पुष्पाणिसमर्पयामि इस मंत्र को पढ़कर पुष्प चढ़ाएं फिर पुष्पों की माला पहनाएं. अब लक्ष्मी देवी को इदं रक्त वस्त्र समर्पयामि उच्चारण कर लाल वस्त्र पहनाएं.।

लक्ष्मी की अंग पूजा(Lakshmi ki Ang Puja)

बायें हाथ में अक्षत लेकर दायें हाथ से थोड़ा-थोड़ा गिराते जायें और उच्चारण करें- ऊं चपलायै नम: पादौ पूजयामि ऊं चंचलायै नम: जानूं पूजयामि, ऊं कमलायै नम: कटि पूजयामि, ऊं कात्यायिन्यै नम: नाभि पूजयामि, ऊं जगन्मातरे नम: जठरं पूजयामि, ऊं विश्ववल्लभायै नम: वक्षस्थल पूजयामि, ऊं कमलवासिन्यै नम: भुजौ पूजयामि, ऊं कमल पत्राक्ष्य नम: नेत्रत्रयं पूजयामि, ऊं श्रियै नम: शिरं: पूजयामि।

अष्टसिद्धि पूजा(Ashtsiddhi Puja)

अणिम्ने नम:, ओं अंग पूजन के लिए हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें. ऊं महिम्ने नम:, ऊं गरिम्णे नम:, ओं लघिम्ने नम:, ऊं प्राप्त्यै नम: ऊं प्राकाम्यै नम:, ऊं ईशितायै नम: ओं वशितायै नम:।

अष्टलक्ष्मी पूजन(AshtLakshami Pujan)

अंग पूजन एवं अष्टसिद्धि के लिए पूजा हाथ में अक्षत लेकर मंत्रोच्चारण करें.ऊं आद्ये लक्ष्म्यै नम:, ओं विद्यालक्ष्म्यै नम:, ऊं सौभाग्य लक्ष्म्यै नम:, ओं अमृत लक्ष्म्यै नम:, ऊं लक्ष्म्यै नम:, ऊं सत्य लक्ष्म्यै नम:, ऊं भोगलक्ष्म्यै नम:, ऊं योग लक्ष्म्यै नम:

नैवैद्य अर्पण(Naivaidh Arpan)

पूजन के बाद देवी को “इदं नानाविधि नैवेद्यानि ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि” मंत्र से नैवैद्य अर्पित करें. और मिष्ठान अर्पित करने के लिए मंत्र बोलें- “इदं शर्करा घृत समायुक्तं नैवेद्यं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि” ।. प्रसाद अर्पित करने के बाद आचमन करायें और बोलें- इदं आचमनयं ऊं महालक्ष्मियै नम:। इसके बाद पान सुपारी चढ़ाकर बोले- इदं ताम्बूल पुंगीफलं समायुक्तं ऊं महालक्ष्मियै समर्पयामि. अब फूल लेकर लक्ष्मी देवी पर चढ़ाएं और उच्चारण करें- एष: पुष्पान्जलि ऊं महालक्ष्मियै नम:.

इस प्रकार सर्व मंत्रोच्चारण के बाद लक्ष्मी जी की पूजा , भगवान विष्णु एवं त्रिलोकीनाथ शिव जी की पूजा करनी चाहिए फिर गल्ले अथवा जहाँ धन और आभूषण रखते हों वहाँ की पूजा करें।

पूजन के बाद सपरिवार आरती और किसी भी भूल तथा गलती के लिए माँ लक्ष्मी से क्षमा याचना करें ।

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