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गणेश पूजा विधि Ganesh Puja Vidhi

गणेश पूजा विधि (Ganesh Puja Vidhi in Hindi)

प्राचीन समय से ही यह प्रथा है कि किसी भी प्रकार की पूजा में भगवान् गणेश की पूजा सर्वप्रथम की जाती है | किन्तु स्वयं भगवान् गणेश की ही पूजा का यह त्यौहार भाद्रपद मास की शुक्ल चतु्र्थी को अत्यंत शुभ माना जाता है। वेद-पुराणों के अनुसार इस दिन को अत्यंत शुभ एवं फलकारी माना जाता है इसीलिए गणेश जी की कृपा पाने हेतु यह व्रत करना चाहिए। साथ ही इस दिन से दस दिनों का गणेश महोत्सव शुरु होता है।

Ganesh Puja Vidhi

गणेश पूजा विधि- पौराणिक कथाओं, नारद पुराण और अन्य पुराणों के व्याख्यान के अनुसार, भाद्रपद मास की शुक्ल चतुर्थी को भगवान गणेश जिनको विनायक भी कहा जाता है उनका व्रत करना चाहिए। यह व्रत करने कुछ प्रमुख नियम निम्न हैं:

भगवान गणेश के इस व्रत में आवाहन, प्रतिष्ठापन, आसन समर्पण, दीप दर्शन आदि द्वारा गणेश पूजन करना चाहिए।
इस पूजा में दूर्वा( दूव घास) अवश्य शामिल करें।
भगवान गणेश जी के अनेकों नामों से उनकी स्तुति करनी चाहिए।
गणेश जी को लड्डुओं से अधिक प्रिय कुछ और नहीं है इसीलिए नैवेद्य के रूप में पांच लड्डू अवश्य रखें।
ऐसा कहा जाता है कि इस पर्व के अवसर पर, रात्रि के समय आसमान में चाँद का दर्शन नहीं करना चाहिए, कहा जाता है कि जो व्यक्ति ऐसा करता है उसको जीवन में झूठे आरोपों का प्रकोप सहन पड़ता है | यदि कदाचित ऐसा हो जाता है कि चाँद दिख जाता है तो इस भूल के लिए और चंद्र देव को प्रसन्न करने हेतु उनकी आराधना करनी चाहिए |

श्रीगणेश पूजा अत्यंत लाभकारी, महत्वपूर्ण व कल्याणकारी है। हर प्रकार के कार्य की सफलता के लिए हो या किसी इच्छापूर्ति के लिए अथवा स्त्री, पुत्र, धन, समृद्धि के लिए या फिर अचानक ही किसी संकट मे पड़े हुए दुखों के निवारण हेतु हो।

अर्थात्‌ जब कभी किसी व्यक्ति को किसी अनिष्ट की आशंका हो या उसे कई प्रकार के शारीरिक या आर्थिक कष्ट उठाने पड़ रहे हो तो उस मनुष्य को पूर्ण मन से शुद्ध होकर परिवार समेत श्रद्धा एवं विश्वासपूर्ण होकर के, विद्वान् ब्राह्मण को बुलाकर, भगवान गणेश और महादेव शिव व उनके परिवार की आराधना, व्रत तथा पूजन करना चाहिए।

यह गणेश चतुर्थी पर्व पत्थर चौथ और कलंक चौथ नाम से भी प्रसिद्ध है। यह त्यौहार हर साल भाद्रपद मास को शुक्ल चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। क्यों कि इसी चतुर्थी को विघ्नहर्ता भगवान गणेश का जन्म हुआ था इस प्रकार से गणेश जी को तिथि प्रिय है। भगवान गणेश विघ्न अर्थात कष्टों को हरने वाले और ऋद्धि-सिद्धि प्रदान करने वाले हैं। यही मूल कारण है कि गणेश प्रभु को सिद्धि विनायक के नाम से भी जाना जाता है।

पूजा विधि आरंभ करने से पूर्व नित्यादि क्रियाओं से निवृत्त होकर शुद्ध आसन में बैठकर सभी पूजन सामग्री:-

पुष्प,
धूप,
दीप,
कपूर,
रोली,
मौली
लाल चंदन,
मोदक( लडडू ) इत्यादि लेकर क्रमानुसार पूजन करना चाहिए |

भगवान श्री गणेश को तुलसी दल व तुलसी पत्र नहीं चढ़ाना चाहिए। उन्हें, शुद्ध स्थान से चुनी हुई दुर्वा को धोकर ही चढ़ाना चाहिए।
गणेश जी को देशी घी से निर्मित मोदक का प्रसाद भी चढ़ाना चाहिए क्यों कि उनको लडडू यानी कि मोदक प्राण प्रिय हैं |
भगवान गणेश के विशेष मंत्र ॐ श्री गं गणपतये नम: का एक सौ आठ बार उच्चारण करने पर उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है |

भगवान लम्बोदर अर्थात गणेश जी के साथ भगवान शिव और माँ पार्वती, उनके नन्दी, पुत्र कार्तिकेय समेत पूर्ण शिव परिवार का पूजन षोड़षोपचार विधि से करना चाहिए।

व्रत व पूजा के समय किसी प्रकार का क्रोध का भाव मन में ना लाएं, ऐसा करना हानिकारक हो सकता है। गणपति जी के नाम का स्मरण करते हुए, पूर्ण रूप से शुद्ध व सात्विक चित्त से प्रसन्न रहना चाहिए।
किसी भी पूजा के उपरांत सभी अविवाहित देवी-देवताओं का शास्त्रानुसार एवं पूर्ण विधिपूर्वक पूजन करने के उपरांत श्री गणेश जी का विसर्जन अविवाहित (अर्थात श्री गणेश प्रतिमा को गंगा या यमुना नदी में प्रवाहित किया जाता है) किया जाता है, किन्तु श्री लक्ष्मी-गणेश का नदी में प्रवाहन या विसर्जन नहीं होता। गणेश चतुर्थी पर्व पर गणेश मूर्ति को उनकी विशेष जयकार ( गणपति बप्पा मोरया ) का ऊँचे स्वर में जय जयकार करते हुए विसर्जित किया जाता है, किन्तु उन्हें अपने निवास स्थान में श्री लक्ष्मी जी सहित रहने के लिए निमंत्रित करें।

नियमानुसार किसी भी प्रकार की पूजा अथवा किसी भी शुभ कार्य के बाद जहाँ किसी अविवाहित देवी या देवता की पूजा की गयी है उनका विसर्जन अवश्य किया जाता है परंतु श्री लक्ष्मी माता एवं गणेश जी का एक साथ विसर्जन नहीं किया जाता | केवल गणेश प्रतिमा का विसर्जन करें परंतु गणेश भगवान को माँ लक्ष्मी सहित अपने घर में स्थान अवश्य दें | पूजन करने के पश्चात सभी देवी-देवताओं की ध्यान करते हुए उनकी जय जयकार करें |

किसी भी भूल गलती के लिए क्षमा याचना करें और घर आएर हुए अथितियों व अन्य भक्तों यथाउचित स्वागत करके उनको प्रसाद एवं भोजन ग्रहण कराएं |

सर्व विधि-विधान पूर्वक पूजन करने के बाद प्रसाद का वितरण करावें, घर आये हुए ब्राह्मण को दान दक्षिणा देते हुए उनको भोजन आदि से संतुष्ट करावें व उनका प्रणाम करके लंबी उम्र, निरोगी होने तथा समस्त सुख और समृद्धि से पूर्ण होने का आशीर्वाद प्राप्त करें |
हमारे धर्म और भारतीय संस्कृति के अनुसार- किसी भी शुभ कार्य या मंगल अवसरों पर उस कार्य के सफल होने के लिए मंगलाचरण या प्रथम पूजनीय देवी-देवताओं के वंदन की बात कही गयी है | भारतवर्ष में किसी भी कार्य से पूर्व भगवान श्री गणेश जी की आराधना की जाती है जिससे वह कार्य बिना किसी विघ्न वाधा के संपूर्ण हो सके | यही कारण रहा है कि हिन्दू सनातन धर्म में सबसे पहले श्री गजानन की पूजा की जाती है और उनके पूजन के उपरान्त ही किसी भी कार्य की शुरुआत होती है | जो व्यक्ति पूर्ण मन लगन से तथा विधि विधान से श्री गणपति जी की भक्ति करता है वह निश्चय ही भगवान गणेश की असीम अनुकंपा और कृपा का पात्र बनते हुए अपनी इच्छाओं की पूर्ती कर लेता है |

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